शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

तो ऐसे गिरेगी केजरी सरकार!

अरविंद केजरीवाल गुरुवार को बिना टोपी और मफलर के थे। स्वेटर भी नया, धुला हुआ लग रहा था। वे बिना तेवर के सहज बोल रहे थे। एक-एक कर उन्होंने एक महीने की उपलब्धियां गिनाई। अपनी सरकार का एक महीने का रिपोर्ट कार्ड पेश किया। लगा कि राजकाज ने केजरीवाल को समझदार, गंभीर बनाया है। भाव-भंगिमा और बोलने के लहजे में सचिवालय के परिवेश का असर दिखलाई दे रहा था। उन्होंने सफाई दी कि एक-दो दिन में फैसले नहीं होते। फैसलों की प्रक्रिया होती है। इसी के हवाले उन्होंने संविदा वाले कर्मचारियों के प्रति सख्ती की सरकार की मजबूरी बताने में संकोच नहीं किया।
रिपोर्ट कार्ड के बाद सवाल-जवाब हुए। सब ठीक चल रहा था। सरकार के चलने, जमने का रंग बन रहा था तभी  रंग में भंग पड़ा। कांग्रेस का एक विधायक प्रेस कांफ्रेस में घुस कर चिल्लाया यह ‘रेडियो झूठिस्तान’ का डायरेक्टर है और झूठ बोल रहा है!  अरविंद केजरीवाल हकबकाए। क्या करते? उठे और उसी के साथ प्रेस कांफ्रेंस  खत्म हुई! मतलब राजकाज केजरीवाल एंड पार्टी को संजीदा बनाए तब भी अब दूसरे ऐसा नहीं होने देंगे। जैसे बीज बोए वैसा केजरीवाल एंड पार्टी को भुगतना पड़ेगा। वे दूसरों को 1984 के दंगों पर घेरेंगे तो दूसरे उन्हें बाटला कांड में झूठा करार देंगे! आप को सौहार्दता, सद्भाव से चलने नहीं देंगे!
हां, एक महीने का यह रिपोर्ट कार्ड भी बना है कि केजरीवाल झूठ बोलते हैं। पहले बिन्नी और अब एक और समर्थक विधायक का ऐसा कहना  मतलब रखता है। इससे इन विधायकों की साख का चाहे जो हुआ हो लेकिन यह मैसेज तो जा रहा है कि यह कैसी आप और उसकी राजनैतिक संस्कृति है?
सवाल है यह बखेड़ा केजरीवाल एंड पार्टी की किरकिरी है या सुर्खियों में सतत रहने की उसकी नियति का प्रमाण है? पर अपन इसके राजनैतिक अर्थ ज्यादा बूझ रहे हैं। केजरीवाल सरकार को अपने आप गिरने देने की एक बिसात बिछ गई है। शायद केजरीवाल सौ दिन का अगला रिपोर्ट कार्ड पेश नहीं कर पाएं। गौरतलब है कि एक महीने में दो विधायकों की बगावत हुई। पहले खुद आप पार्टी के बिन्नी ने शोर किया। अरविंद केजरीवाल को झूठा बताया और गुरुवार को समर्थक पार्टी कांग्रेस के विधायक आसिफ मोहम्मद ने केजरीवाल को झूठा करार करते हुए कहा वे अब उनकी सरकार का समर्थन नहीं करेंगे। फिर भले कांग्रेस उन्हें पार्टी से बाहर निकाल दे!
सो एक महीने में दो विधायकों का समर्थन घटा। उस नाते अगले पंद्रह दिनों में उनका एक और समर्थक विधायक टूटे तो आश्चर्य नहीं होगा। ध्यान रहे बिन्नी के साथ आप के ही एक विधायक कमांडो सुरेंद्र सिंह ने कहा हुआ है कि उसके विरोध का तरीका गलत है लेकिन उसके उठाए मुद्दे विचारणीय हैं। तीसरा विधायक टूटा तो जनता दल यू का समर्थक विधायक शुएब इकबाल या भाजपा बैकग्राउंड वाले निर्दलीय विधायक देवेंद्र का विधानसभा में पाला बदलना नामुमकिन नहीं है। अभी केजरीवाल सरकार की कुल जमा ताकत 38 विधायक हैं इसमें से चार विधायक सदन में सरकार को अंगूठा दिखा दें तो वह सदन में अल्पमत में आ जाएगी। तब केजरीवाल का उपराज्यपाल के यहां जा कर इस्तीफा देना होगा।
आज आसिफ मोहम्मद ने जिस अंदाज में हल्ला किया और कांग्रेस मौन रही उसका सीधा अर्थ केजरीवाल सरकार की उलटी गिनती है। कांग्रेस समर्थन वापसी का पत्र उपराज्यपाल को नहीं देगी। मतलब सरकार गिराने की बदनामी वह अपने सिर नहीं लेगी। उसका यह स्टैंड होगा कि हमने तो समर्थन दिया पर यदि सदन में सरकार खुद प्रबंध नहीं कर पाए और एक-एक कर विधायक बागी हो जाएं तो पार्टी क्या करे?
ध्यान रहे अरविंद केजरीवाल और उनकी सरकार का अगले पंद्रह दिन का एजेंडा विधानसभा में जनलोकपाल बिल पेश करके उसे पास कराने का है। इसी में सरकार को विधानसभा में घेर कर उसे गिराने का ब्ल्यूप्रिंट बना लगता है। यों यह मुमकिन है कि दिल्ली के पुराने कांग्रेसी 1984 के दंगों की जांच के लिए एसआईटी बनाने के केजरीवाल सरकार के इरादे से बौखलाए हो और बदले में
बाटला हाउस एनकाउंटर पर
भी एसआईटी का हल्ला कराया। केजरीवाल के पैंतरे से उन्हें
सिख वोटों की सहानुभूति मिले तो बाटला हाउस एनकाउंटर के जरिए उन्हें मुसलमानों में विलेन बनाने जैसी राजनैतिक पैंतरेबाजी भी मुमकिन है।
जो हो, इधर एक महिना का रिपोर्ट कार्ड आया और उधर कांग्रेस ने केजरीवाल सरकार के पतन का खाका जाहिर किया। कांग्रेस खुद सरकार नही गिराएगी। पर विधायक बगावत करेंगे। यदि विधानसभा सत्र नहीं हो और जनलोकपाल बिल टले तब तो केजरीवाल सरकार को दो-तीन महीने खतरा नहीं है। पर फरवरी में ही क्योंकि केजरीवाल भी जनलोकपाल पास कराना चाह रहे हैं सो शक्ति परीक्षण तय है। तभी अपना मानना है कि एक महीने के रिपोर्ट कार्ड के बाद केजरीवाल दूसरे महीने या सौ दिन का रिपोर्ट कार्ड शायद ही पेश कर पाएं!

शनिवार, 28 सितंबर 2013

अध्यादेश दस्तखत के लायक नहीं

केंद्र सरकार अब एक नई मुसीबत में फंस गई है। यह मुसीबत किसी और ने नहीं, राष्ट्रपतिजी ने खड़ी कर दी है। राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी सरकार के इस अध्यादेष के प्रति सशंकित है कि सजायाफ्ता सांसदों या विधायकों को तत्काल पदमुक्त न किया जाए। सरकार ने यह अध्यादेश सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश को प्रभावहीन बनाने के लिए जारी किया है कि यदि कोई सांसद या विधायक अपराधी पाया गया और किसी अदालत ने उसे दो साल या ज्यादा की सजा दे दी तो उसे तुरंत इस्तीफा देना होगा। फिलहाल कानून उन्हें अपील की छूट देता है। वे अपील-काल में अपने पदों पर बने रह सकते हैं। अब अदालत का फैसला ऐसा है कि उसने सारे दलों के नेताओं के पसीने छुड़ा दिए हैं। देश के सैकड़ों विधायकों और सांसदों पर ऐसे मुकदमे चल रहे हैं, जिनमें उन्हें दो साल से ज्यादा की सजा हो सकती है। जैसे ही सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला आया, सभी दल एक हो गए। किसी भी दल ने इसका स्पष्ट समर्थन नहीं किया। एक सर्वदलीय बैठक में 13 अगस्त को तय हुआ कि इस मुद्दे पर संसद में एक विधेयक लाया जाए और सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को रद्द किया जाए। लेकिन सरकार ने इस विधेयक के कानून बनने का इंतजार नहीं किया और वह एक अध्यादेश ले आई। यह अध्यादेश अभी राष्ट्रपति के पास हस्ताक्षर के लिए गया है। इस अध्यादेश के आते ही कई दलों को पल्टी मारने का मौका मिल गया। इसके बहाने वे कह रहे हैं कि वे अपराधी सांसदों और विधायकों को बचाने के पक्ष में नहीं हैं। इसीलिए वे इस अध्यादेश के विरूद्ध हैं। वे पूछ रहे हैं कि सरकार को आनन-फानन अध्यादेश लाने की जल्दी क्यों पड़ी हुई है? वे यह नहीं बता रहे कि वे सिर्फ इस अध्यादेश् के विरोधी हैं या अपराधी सांसदों और विधायकों को बचाने के लिए जो कानून बनाया जा रहा है, उसके भी विरोधी हैं? वास्तव में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के विरूद्ध जब सारे मौसेर भाई एक दिखाई पड़े तो जनमत भी एकमत में बदल गया। देश में जनता का विरोध देखकर प्रतिपक्षी दल घबरा गए। घबराए तो कांग्रेसी भी लेकिन वे क्या करें? कुछ कांग्रेसी नेताओं ने भी साहसपूर्वक इस अध्यादेश को अनुचित बता दिया। अब राष्ट्रपति ने गृहमंत्री, विधि मंत्री और संसदीय मामलों के मंत्रियों को बुला भेजा है, यह जानने के लिए कि अध्यादेश निकालने की क्या जरूरत है? सबको पता है कि लालू प्रसाद यादव और रषीद मसूद के विरूद्ध अगले सप्ताह अदालती फैसले आनेवाले हैं। सिर्फ इन दो नेताओं को बचाने के लिए कांग्रेस अपनी गर्दन क्यों फंसाए? भ्रष्टाचार के लिए कांग्रेस पहले से बदनाम है। अब उस पर राजनीति के अपराधीकरण का बिल्ला भी क्यों चिपकाना चाहिए? इस अध्यादेश पर राष्ट्रपति आंख मींचकर दस्तखत न करें तो वे अपने पद को गरिमा प्रदान करेंगे। यदि वे इसे वापस लौटा दें तो मंत्रिमंडल इसे दुबारा उनके पास भेजने का साहस नहीं कर सकता। अध्यादेश बकवास है या सरकार बकवास है? कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने सरकार के लिए राष्ट्रपति से भी ज्यादा मुसीबत खड़ी कर दी है। उन्होंने एक प्रेस कांफ्रेंस में अचानक कह दिया कि यह अध्यादेश बकवास है। इसे फाड़कर फेंक देना चाहिए। उन्होंने अध्यादेश के साथ-साथ सरकार की भी मिट्टी पलीत कर दी है। अध्यादेश तो अब खत्म हो ही जाएगा लेकिन अब यह मनमोहन सरकार किस मुंह से कुर्सी में लदी रहेगी? अगर प्रधानमंत्री ज़रा भी पानीदार आदमी हैं तो उन्हें न्यूयार्क से ही अपना इस्तीफा भेज देना चाहिए। राष्ट्रपति अध्यादेश की बजाय इस इस्तीफे को स्वीकार करें। राहुल गांधी का यह विस्फोट जनमत का सम्मान जरूर है और प्रशंसनीय भी है लेकिन यह सवाल भी खड़ा करता है कि यह कैसी पार्टी और कैसी सरकार है? सरकार का इतना बड़ा निर्णय और पार्टी-नेतृत्व को उसकी जानकारी तक नहीं थी। यदि जानकारी थी तो तब राहुल गांधी को क्या हुआ था? वे तीन-चार दिन क्या करते रहे? जो भी हो, इस सारे प्रकरण से कांग्रेस की जबर्दस्त किरकिरी हो रही है। - See more at: http://www.nayaindia.com/opinion/not-worth-the-sign-ordinance-162123.html#sthash.9uVWQtzO.dpuf